अहसानमंद हूं ज़िन्दगी की..

अहसानमंद हूं मैं ज़िन्दगी की,
जो राहों में रोड़े उसने अटकाए,
बिन मेहनत इंसान को,
चैन की नींद कहां से आए?

अहसानमंद हूं ज़िन्दगी की,
जो अंधियारों से गुज़री मेरी राहें,
उनसे बेहतर उजाले की अहमियत,
और हमें कौन बताए?

अहसानमंद हूं ज़िन्दगी की,
जो बार बार मुझे हार का चेहरा दिखाए,
हर जीत की अहमियत,
इससे बेहतर और कौन बताए?

अहसानमंद हूं ज़िन्दगी की,
जो उड़ने दिया मुझे पंख फैलाए,
मीलों का सफर तय करके भी यह पंछी,
अपने घरोंदे को कैसे भुलाए?

अहसानमंद हूं ज़िन्दगी की,
जो लोगों की अलग की मुझसे राहें,
स्वार्थ बिन दोस्ती का होना,
इंसान इससे ज़्यादा और क्या चाहे?

अहसानमंद हूं ज़िन्दगी की,
जो कहती है, हमेशा ना रहेंगी ये राहें,
हर एक पल की कीमत,
इससे बेहतर और कौन बताए?

— साक्षी

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